Harendra Kumar Tyagi

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Harendra Kumar Tyagi

"सेना की वर्दी"

किसी को गर्मी तो किसी को सर्दी अच्छी लगती है,

पर मुझे तो अपने भाई की वो वर्दी अच्छी लगती है,

जो कभी न ठंडा देखती है, न गर्म देखती है,

बस वो सरहद पर एक ही चीज, अपना कर्म देखती है,

 

मतलब नहीं है उसे किसी के केश से,

मतलब नहीं है उसे किसी के वेश से,

मतलब नहीं उसे आराम के परिवेश से,

उसे तो मतलब है बस अपने भारत देश से,

 

इस वर्दी के आगे बौने हैं, सब महंगे परिधान,

टिकी हुई है इस वर्दी पर भारत मां की शान,

चाहे प्रलयंकर दिन हो या हो कैसी भी रात,

कभी भी मंद नहीं पड़ते, इस वर्दी के जज़्बात,

 

यह वर्दी नसीब होती है किसी सौभाग्यशाली को,

सरहद पर जो शांति वृक्ष सींचता है उस माली को,

जिनकी बहादुरी के आगे पर्वत भी शर्मिंदा है,

बेटे वहां डटे हुए हैं तो हम सब ज़िंदा हैं।

 

जब ये वर्दियां तिरंगे में लिपट घर आती है,

तब इस भारत देश की आंखें भर आती हैं,

काल के गाल में कुछ इस तरह भी समाए हैं,

कभी कभी तो ये रूमाल में बंधकर आए हैं।

 

जिनके चरणों की रज से चट्टानें शबनम हो जाती हैं,

जिनकी करुण कहानी पढ़ कर आंखें नम हो जाती हैं,

लंबी उम्र की दुआ करना, जीत का हार पहना देना।

सैनिक गर कहीं मिल जाए तो अपने गले लगा लेना,

 

आओ इस वर्दी को अब दिल से शीश नवाते हैं,

अपनी सेना की इज्ज़त कर, गीत उसी के गाते हैं।

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Amisha's Poem

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